Posts

Showing posts with the label आलोचनात्मक कविता

मेरी शुभकामना

(इस कविता में देश के लिए, धर्म के लिए, गाय के लिए एक आदर्श शुभकामना प्रस्तुत की गई है। मानव की प्रकृति से दूरी तथा पैसों की प्रति आकर्षण को दिखाया गया है।) मैं शिव मंदिर गई, मैंने नंदी बैल देखा,  उनके कानों में सबको मन्नत मांगते देखा,  मैंने सोचा हाय! यह कैसी विधाता की लेखा, बैल को रोड पर भटकने पर मजबूर करने वाले लोगों ने, चांदी की कैसी सुंदर मूर्ति बैल की है बनाई!  मैंने भी अपनी मनोकामना उनके कानों मे जाकर सुनाई। मैंने मांगा नंदी से-- गोमाता न भटके  गली- गली। गंगा माता स्वच्छ रहे । गीता सबके व्यवहार में रहे । सब लोगों का आपस में प्यार रहे । विश्व सदा हमारा एक ही परिवार रहे। भ्रष्टाचार के रोग से कोई पीड़ित न रहे। हे नंदी देवता! मेरी यह मनोकामना स्वीकार करना  यदि ये मेरी भूल है तो मझे माफ करना। लोग अपने घर को सजाते हैं,  पर गलियों को गंदा बनाते हैं, नहीं सोचते लक्ष्मी माता आएंगी कहां से? लोग मंदिर को पवित्र रखते हैं,  पर उसके बाहर अपवित्रता होती है, नहीं सोचते अपवित्र हो अंदर जाएंगे कैसे? हे प्रभु!  सबके मन को पवित्र कर दो।  कण- कण में तुम्हार...