नारी तेरे कितने रूप(निबंध)

 (इस आर्टिकल में सही मायने में नारी को किस प्रकार शिक्षित किया जाना चाहिए तथा नारी के अनेक रूपों के  बारे में  जानकारी दी गई है।)


नारी का महत्व

नारी समाज और परिवार का एक अभिन्न अंग है। वह माता, भगिनी, पुत्री तथा अन्य अनेक रिश्तो के रूप में परिवार के लिए आवश्यक अपने सभी कर्तव्य निभाती है। समाज में शिक्षित होकर अलग-अलग पदों पर आसीन होकर समाज के कल्याण के लिए नए-नए निर्णय लेती है।

नारी यदि शिक्षित है, संस्कारी है, तो समाज में भलाई का संचार करेगी। परिवार में सुख-संपदा का प्रतीक बनेगी। समाज और परिवार के लिए सही और सटीक निर्णय लेगी।

यही नारी यदि कुसंस्कारी हो अर्थात उसमें अलगाव और बिखराव के संस्कार हैं, वह स्वार्थी है, धन लोलुप है, तो ऐसी स्त्री नित नए स्वांग रचकर दुराचार एवं हिंसा फैलाने में जिम्मेदार मानी जाती है।


नारी तेरे कितने रूप

नारी समाज का एक अभिन्न अंग है, जिसके बिना किसी समाज की कल्पना ही नहीं की जा सकती। लेकिन नारी के समाज में अलग-अलग रूप देखने को मिलते हैं। कभी तो नारी समाज का उद्धार करने वाली सावित्रीबाई फुले बन जाती है, तो कभी विश्वासघात करके परिवार और समाज का विनाश करने वाली बन जाती है।

नारी पुरुष की संगिनी

नारी सदा पुरुष की संगिनी बनकर जीवन के हर पथ पर उसका साथ निभाती है। परिवार के सदस्यों के बीच अपने रिश्ते की जिम्मेदारी निभाना हो, चाहे पति को आर्थिक मदद देने के लिए कोई बाहरी काम करना हो। पति से मिले पैसों को बचा-बचा कर घर के लिए आवश्यक सामग्री खरीदना हो अथवा पैसे बचाने के लिए घर के अनेक कामों को खुद करना हो। किसी भी बात में नारी कभी पीछे नहीं हटती।
अपने पति के साथ मिलकर अपने सभी कर्तव्यों को निभाने वाली स्त्री या नारी साक्षात लक्ष्मी का रूप कही जाती है।

इसके विपरीत ऐसी भी नारियां हैं, जो सिर्फ अपने स्वार्थ के बारे में सोचती है। उनके लिए परिवार के सुख से ज़्यादा अपना सुख मायने रखता है। ऐसी स्त्रियों को शूर्पणखा तथा ताड़का का अवतार कहा जा सकता है।


नारी एक वीरांगना

मुसीबत के समय नारी एक सच्ची वीरांगना का रुप धारण कर लेती है। चाहे परिवार पर कोई मुसीबत आए या फिर समाज पर, वह हर मोल देखकर उसकी रक्षा के लिए खड़ी हो जाती है। कभी झांसी की रानी बनकर अपने स्वराज के लिए लड़ते-लड़ते अपने प्राण न्योछावर कर देती है, तो कभी कल्पना चावला बनकर अंतरिक्ष में अपने देश का झंडा फहरा जाती है।

आधुनिक समय में नारी अनेक पदों पर आसीन होकर, हर क्षेत्र में अपनी शक्ति और बुद्धि का परिचय दे रही है। सेना, राजनीति, मनोरंजन आदि अनेक क्षेत्रों में आज नारी का ही वर्चस्व नजर आता है। छोटे-मोटे घरेलू व्यापार करके भी नारी अपनी बुद्धिमत्ता का परिचय देती है तथा एक बिजनेस मॉडल के तौर पर अनेक बड़ी-बड़ी कंपनियों में भी अपने बुद्धि-विवेक का परिचय देती है।

लेकिन समाज में हर नारी का स्वरूप ऐसा नहीं है, कहीं तो नारी को डरकर, भयभीत होकर समाज में संकुचित जीवन बिताना पड़ता है, तो कहीं वह अपने रौद्र रूप का परिचय कराते हुए हिंसा को समाज का हिस्सा बनाने के लिए तत्पर रहती है। ऐसी हिंसक नारियों के लिए तो हम यही कह सकते हैं कि ईश्वर ने समाज को दंडित करने के लिए यमराज का कोई स्वरूप भेजा है।


नारी दूसरी नारी के शत्रु के रूप में

जब भी नारी शिक्षा की बात आती है, तो भाषण में यही सुनने को मिलता है कि पुरुषों के कारण ही स्त्रियां पीछे रह जाती है। लेकिन सच तो यह है कि पुरुष से भी अधिक एक नारी दूसरी नारी की शत्रु बन जाती है। ऐसे उदाहरण आप अक्सर परिवार में और समाज में देखते रहते हैं।

कभी सास बहू की दुश्मन के रूप में देखी जाती है, तो कभी बहू को सास को उत्पीड़ित करते हुए पाया जाता है। कभी कोई स्त्री जब सफलता की ऊंचाइयों पर पहुंच रही होती है, तो उसकी टांग खींच कर नीचे गिराने वाली भी एक स्त्री ही होती है।

यदि समाज में ऐसी स्त्रियों का वर्चस्व रहा, तो पुरुष की क्या औकात की स्त्री को नीचा दिखाए, स्त्री जाति तो खुद ही अपने समाज को नीचे गिरा देगी।

आदर्श नारी कौन?

एक आदर्श नारी समाज की हर बाधा को पार करते हुए अपने हर कर्तव्य का पालन करती है। समाज में ऐसी आदर्श नारियों की आवश्यकता है।

एक आदर्श मां

एक आदर्श नारी जब एक मां का कर्तव्य निभाती है, तो उसे चाहिए कि अपने बच्चों को अच्छे संस्कार दे। लड़की पर जितनी पाबंदियां लगाई जाती है, लड़कों पर भी उतनी ही बंदिशें लगा कर रखें, ताकि कोई लड़का किसी अन्य लड़की के लिए कोई भी दुराचार करने से डरे। लड़कियों को जिस प्रकार संध्याकाल के बाद बाहर निकलने से रोका जाता है, लड़कों को बिना आवश्यक आवश्यकता के आवारा की तरह घूमने से रोका जाए, तभी समाज में दुराचार कम होगा।
एक आदर्श मां यदि अपनी बेटी को भी ऊंचे संस्कार दे, तो रिश्तों के बीच बढ़ती दूरियां निश्चित ही कम होने लगेगी।


एक आदर्श पत्नी

एक आदर्श पत्नी वह है, जो पति को गलत कार्य करने के लिए न उकसाए, सदा ही अच्छी राह पर चलने की प्रेरणा दे, भले ही उसके लिए कुछ कठिनाइयां उठानी पड़ें।

यदि एक पत्नी अपने पति द्वारा दी गई सुख संपत्ति से ही खुश रहे अथवा खुद परिश्रम करे तथा अपने पति से धन के लिए कोई भी बुरा कार्य करने के लिए उसे प्रेरित ना करे, तो समाज में बहुत से गलत कार्य होने बंद हो जाएंगे। भारतीय संस्कृति में धर्मपत्नी उसी को कहा गया है, जो पति के साथ अपने धर्म का उचित प्रकार से पालन करे तथा पति को धर्म के पथ पर अग्रसर होने की प्रेरणा दे।


एक आदर्श पुत्री

एक आदर्श पुत्री वही है, जो अपने माता-पिता की शान को सदा सर्वदा बढ़ाती रहे। जब पढ़ने का मौका मिले, तो वह इसका सदुपयोग करे और समाज में अपनी एक पहचान बनाए, जिस पर माता-पिता को भी गर्व हो। यदि ससुराल जाए, तो अपनी सूझबूझ से अपने माता-पिता का मान बढ़ाएं। अपने पति के परिवार को अपने मायके के परिवार से भी ऊंचा स्थान दे।


आदर्श नारी के लिए शिक्षा और संस्कार दोनों जरूरी


उपर्युक्त आदर्श नारी का जो चित्र प्रस्तुत किया गया है, उसके लिए आवश्यक है कि नारी को शिक्षा के साथ-साथ भारतीय परंपरा के अनुसार ऊंचे संस्कार भी दिए जाएं। समय आने पर अपनी जिम्मेदारी का बोझ उठाने लायक भी बनाया जाए। क्योंकि एक आदर्श नारी ही अच्छे समाज की परिकल्पना को साकार कर सकती है।

नारी, नारी के प्रति आपस में ईर्ष्या ना रखे, पुरुष नारी को अपना अस्तित्व बनाने में सहयोग दें। ऐसा करने पर ही एक आदर्श नारी का निर्माण हो पाएगा और इसीसे एक सुदृढ़ समाज की परिकल्पना भी साकार हो पाएगी।






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