भारत की प्राचीन परंपराएं और उनके वैज्ञानिक तथ्य

 (इस आर्टिकल में भारतीय संस्कृति में मान्य कुछ प्राचीन परंपराएं, जिनमें वैज्ञानिक रूप से  कुछ तथ्य हैं। ऐसे ही कुछ परंपराओं की जानकारी दी गई है।)


भारत की प्राचीन परंपराएं एवं उनके वैज्ञानिक तथ्य

भारतीय संस्कृति कुछ विशेष परंपराओं एवं मान्यताओं के लिए प्रसिद्ध है, जिनका पालन आज भी लोग करते हैं। वास्तव में यह परंपराएं हमारे ऋषि-मुनियों द्वारा कुछ वैज्ञानिक अनुसंधानों के आधार पर प्रतिपादित की गई थीं। आज भी उन परंपराओं को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखने पर उनमें कुछ ना कुछ तथ्य निकल कर सामने आ ही जाते हैं। इससे हमें ज्ञात होता है कि हमारे ऋषि - मुनि कितने उच्च कोटि के वैज्ञानिक थे।

मेहमान आने पर कुछ मीठा अथवा गुड़ देने की परंपरा

यदि कोई मेहमान आता है, तो हम उसे सबसे पहले कुछ मीठा अथवा गुड़ पानी पीने के लिए देते हैं, ऐसा इसलिए जाता है, क्योंकि जब वह कहीं से दूर से यात्रा करके आता है तो मार्ग में होने वाली थकावट के कारण जो उसके अंदर ऊर्जा की कमी उत्पन्न हो गई है, उसे दूर कर नई उर्जा प्रदान की जा सके।

मीठे के स्थान पर आजकल जो कृत्रिम मिठाइयां प्रयोग में लाई जा रही हैं, निश्चित ही उसे स्वास्थ्य को हानि होती है। यद्यपि गुड़ खाने से स्वास्थ्य को किसी प्रकार की कोई हानि नहीं होती है, यदि मधुमेह की समस्या ना हो। लेकिन मीठा खाने से हमारे शरीर को तुरंत ऊर्जा मिलती है।


समोसा, पकौड़ी  आदि के साथ हरी चटनी खाने की परंपरा

हरी चटनी जो कि मिर्ची, लहसुन, धनिया, अदरक, पुदीने आदि के मिश्रण से बनी होती है, इन सभी चीजों में तैलीय पदार्थ को पचाने की पूरी क्षमता होती है तथा तली हुई चीजों को इस प्रकार की चटनी के साथ खाने से उतना नुकसान नहीं होता। 

आजकल जो हम पैक्ड टमाटर सॉस के साथ पकौड़ी आदि तली हुई चीजों का सेवन कर रहे हैं, वह स्वाद के लिए तो हमें अच्छा लगता है, लेकिन स्वास्थ्य के लिए वह बिल्कुल भी अच्छा नहीं है। इसलिए हमें हरी चटनी का प्रयोग ना सिर्फ तली हुई चीजों के साथ बल्कि अपने भोजन में भी करना चाहिए।


नवरात्र के दिनों में सावधानी से रहने की परंपरा


हमारे भारतीय कैलेंडर के अनुसार वर्ष में दो नवरात्र आती हैं। दोनों ही नवरात्र ऐसे समय में आती है, जब एक मौसम समाप्त होकर दूसरा मौसम शुरू होता है। ऐसे समय में संक्रमण का खतरा बना रहता है, इसलिए किसी भी प्रकार के संक्रमण से अपनी रक्षा करने के लिए हमारे देश के ऋषि-मुनियों ने दोनों नवरात्रि के समय बाहर घूमने, लोगों से मिलने, दूसरे के हाथ से किसी भी प्रकार की भोजन की वस्तु लेने आदि से निषेध बताया है, क्योंकि इससे संक्रमण एक-दूसरे को लग सकता है।

नवरात्रि में 9 दिन व्रत करने का केवल एक ही उद्देश्य है, अपने शरीर में आंतों में जो पुराना मल जमा है, वह निकल जाए। ऐसा तभी संभव होता है, जब हम भोजन में कोई अनाज न खाकर केवल फल और अन्य शाकाहार ही लें।

नवरात्र में हवन आदि करने से हमारे पर्यावरण में स्थित छोटे-छोटे जीवाणुओं का नाश हो जाता है तथा वातावरण जीवाणु रहित और सुगंधित हो जाता है।

नवरात्र के इन सभी नियमों का सही प्रकार से पालन करके निश्चित ही हम स्वस्थ जीवन जी सकते हैं। डॉक्टर और दवाइयों में होने वाला हमारा बहुत सारा खर्च बच सकता है।



यात्रा पर जाते समय दूध के सेवन से निषेध की परंपरा


दूध पचने में भारी होता है। यात्रा के दौरान हमें बहुत समय तक चलना पड़ सकता है अथवा बिना सोए रहना पड़ सकता है। ऐसे में दूध जो पचने में भारी होता है, वह हमारे स्वास्थ्य को खराब कर सकता है। खराब स्वास्थ्य हमारे यात्रा में व्यवधान उत्पन्न कर सकता है। इन सब से बचने के लिए हमें यात्रा पर जाते समय दूध नहीं पीना चाहिए।

क्योंकि लोग दूध और दही एक साथ नहीं सेवन कर सकते, इसलिए हमारे पूर्वजों ने यह भी परंपरा बना दी कि कहीं जाने से पहले दही के साथ कुछ मीठा खा कर जाया जाए, जो कि स्वास्थ्य के लिए हितकर होता है।

भोजन के बाद मुखवास लेने की परंपरा

हमारे मुंह में जो लार बनती है, वह क्षारीय होती है एवं भोजन को पचाने में अनेक प्रकार से  सहयोग करती है। भोजन करने के पश्चात यदि हम मुख में मुखवास के रूप में सौंफ, जीरा, अजवाइन, इलायची आदि लेकर चूसते हैं, तो अधिक से अधिक यह लार बनती है और पेट में जाती है तथा भोजन को पचाने में सहयोगी बनती है।

इसलिए भोजन करने के पश्चात हमारे यहां मुखवास की परंपरा चली आ रही है।


पान और चूना खाने की परंपरा

पान अर्थात सुपारी का पत्ता जिसमें भरपूर मात्रा में क्लोरोफिल होता है, इसे खाने से हमारे रक्त की अनेक प्रकार से सफाई होती है। पान को चूसते समय जो लार बनती है, वह पेट में जाकर पाचन- क्रिया में सहयोगी बनती है। यदि हम सादा पान जिस में इलायची, सौंफ आदि  होती हैं, तो हमें अनेक प्रकार के लाभ होते हैं।

चूने को अगर गेहूं के दाने के बराबर मात्रा में लिया जाए, जिसे हम पान पर लपेट कर पान के साथ चूस चूस कर अंदर लेते हैं, तो हमारे शरीर को कैल्शियम की उपयुक्त मात्रा उपलब्ध हो जाती है। इस प्रकार पान और चूना सही रूप में लेने से हमारे लिए लाभकारी होता है।

पान खाने की इस परंपरा को लोगों ने नासमझी के कारण प्रदूषण का कारण बना दिया है। इतना ही नहीं पान में नशीली चीजों का सेवन करके इसका दुरुपयोग हो रहा है, जो हमारे स्वास्थ्य के लिए अच्छा नहीं है।



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